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| डॉ. जगजोत सिंह |
लुधियाना, 09 मार्च, 2026 (संजीव आहूजा): बोर्ड परीक्षाओं को अक्सर बच्चों के जीवन का एक बड़ा पड़ाव माना जाता है। लेकिन मनोचिकित्सक के नज़रिये से देखें तो यह समय बच्चों के लिए भावनात्मक रूप से बहुत संवेदनशील भी होता है। इस दौरान कई बच्चे पढ़ाई की कमी से नहीं, बल्कि तनाव, डर और अकेलेपन की भावना से परेशान हो जाते हैं। उन्हें सबसे ज़्यादा ज़रूरत ट्यूशन या टेस्ट सीरीज़ की नहीं, बल्कि माता-पिता के सहयोग और समझ की होती है।
माता-पिता इन तरीकों से बच्चों का तनाव कम कर सकते हैं:
1. परिणाम से ज़्यादा मेहनत की सराहना करें
- बच्चों को समझाएँ कि अंक ही उनकी पहचान या भविष्य तय नहीं करते।
- उनकी नियमित मेहनत और ईमानदारी की तारीफ करें।
- बच्चों की तुलना दोस्तों या रिश्तेदारों से न करें।
- जब बच्चों को लगता है कि उन्हें सिर्फ अंकों से नहीं आंका जा रहा, तो उनमें असफलता का डर कम हो जाता है।
- बच्चों को कम से कम 7 घंटे की अच्छी नींद लेने दें।
- पूरी रात जागकर पढ़ने की आदत से बचाएँ।
- घर का माहौल शांत और स्थिर रखें।
- नींद की कमी से चिंता, चिड़चिड़ापन और ध्यान की कमी बढ़ सकती है।
- अचानक चुप हो जाना या अलग-थलग रहना
- बार-बार रोना या जल्दी गुस्सा आना
- भूख या नींद में बदलाव
- खुद को बार-बार दोष देना या निराशा जताना
- ये आलस के संकेत नहीं हैं, बल्कि मानसिक तनाव का संकेत हो सकते हैं।
- बच्चों को रोज़ थोड़ा टहलने या हल्की एक्सरसाइज के लिए प्रोत्साहित करें।
- दोस्तों से थोड़ी बातचीत की अनुमति दें।
- आराम को पढ़ाई में लापरवाही न समझें।
- छोटे-छोटे ब्रेक लेने से दिमाग तरोताज़ा रहता है और पढ़ाई बेहतर होती है।
- बच्चों से खुले और आराम से सवाल पूछें।
- उनकी बात ध्यान से सुनें, तुरंत सलाह या डाँट न दें।
- जब बच्चा पहले से तनाव में हो, तब परिणाम या सज़ा की बात न करें।
डॉ. जगजोत सिंह, कंसल्टेंट, मानसिक स्वास्थ्य एवं व्यवहार विज्ञान, फोर्टिस अस्पताल, लुधियाना कहते हैं, “बोर्ड परीक्षा के समय बच्चे सिर्फ किताबें नहीं पढ़ रहे होते, वे असफलता का डर, लोगों के जजमेंट का डर और कभी-कभी माता-पिता की उम्मीदों पर खरा न उतरने का डर भी झेल रहे होते हैं। ऐसे समय में उन्हें घर में एक ऐसा माहौल चाहिए जहाँ वे खुलकर कह सकें कि ‘मुझे डर लग रहा है।’ जब माता-पिता दबाव की जगह सहयोग देते हैं और आलोचना की जगह समझ दिखाते हैं, तो बच्चे ज़्यादा मजबूत बनते हैं।”
अगर बच्चे में लगातार नींद की कमी, बहुत ज़्यादा उदासी, अकेलापन या निराशा दिखाई दे, तो समय रहते काउंसलर या मनोचिकित्सक से सलाह लेना ज़रूरी है। बोर्ड परीक्षा कुछ समय की होती है, लेकिन बच्चे की मानसिक सेहत जीवनभर साथ रहती है। इस परीक्षा के मौसम में बच्चों को सहारा, समझ और भरोसा देना ही असली सफलता है।
