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| डॉ. अनिश भाटिया |
लुधियाना, 09 फरवरी, 2026 (संजीव आहूजा): ओवेरियन कैंसर एक गंभीर और संभावित रूप से जानलेवा बीमारी है, जो महिला प्रजनन प्रणाली के एक महत्वपूर्ण अंग—अंडाशयों (ओवरी)—को प्रभावित करती है। भले ही इसकी तुलना में कुछ अन्य कैंसर अधिक आम हों, फिर भी भारत में यह तीसरा सबसे सामान्य स्त्रीरोग संबंधी कैंसर है और महिलाओं में कैंसर से होने वाली मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल है। इस रोग की पहचान प्रायः देर से होती है, जिसके कारण अधिकांश मामलों में इसका निदान उन्नत अवस्था में होता है। हालांकि, जन-जागरूकता, समय पर जांच और आधुनिक उपचार सुविधाओं से इसके परिणामों में उल्लेखनीय सुधार संभव है।
अंडाशय अंडाणुओं के निर्माण तथा एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे महत्वपूर्ण हार्मोन के स्राव में अहम भूमिका निभाते हैं। जब अंडाशयों की कुछ कोशिकाएं असामान्य रूप से अनियंत्रित वृद्धि करने लगती हैं, तब ओवेरियन कैंसर विकसित होता है। इसके कई प्रकार होते हैं, जिनमें सबसे आम एपिथीलियल कैंसर है, जो अंडाशय की बाहरी परत से उत्पन्न होता है। इसके अलावा जर्म सेल और स्ट्रोमल प्रकार के कैंसर भी पाए जाते हैं।
यह कैंसर किसी भी महिला को हो सकता है, लेकिन कुछ कारक इसके जोखिम को बढ़ाते हैं। इनमें बढ़ती आयु (विशेषकर रजोनिवृत्ति के बाद), परिवार में ओवेरियन या स्तन कैंसर का इतिहास, BRCA1 या BRCA2 जैसे आनुवंशिक म्यूटेशन, कभी गर्भधारण न होना तथा लंबे समय तक हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी का उपयोग शामिल है। जोखिम कारकों की मौजूदगी का अर्थ यह नहीं कि रोग निश्चित रूप से होगा, लेकिन नियमित निगरानी और सतर्कता अत्यंत आवश्यक हो जाती है।
शीघ्र पहचान की चुनौतियाँ और लक्षण
ओवेरियन कैंसर की प्रारंभिक अवस्था में पहचान करना कठिन होता है, क्योंकि इसके लक्षण अक्सर हल्के, अस्पष्ट होते हैं और सामान्य पाचन या मूत्र संबंधी समस्याओं से मिलते-जुलते प्रतीत होते हैं। वर्तमान में बिना लक्षण वाली महिलाओं के लिए इसकी कोई विश्वसनीय स्क्रीनिंग जांच उपलब्ध नहीं है, जिसके कारण अनेक मामलों का निदान देर से हो पाता है।
हालांकि प्रारंभिक लक्षण साधारण लग सकते हैं, लेकिन इनकी विशेषता यह है कि ये लगातार बने रहते हैं। पेट में लगातार सूजन या भारीपन, पेल्विक या पेट दर्द, जल्दी पेट भर जाना, बार-बार पेशाब लगना, मल त्याग की आदतों में बदलाव, बिना स्पष्ट कारण वजन कम होना या लगातार थकान जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर चिकित्सकीय परामर्श से शीघ्र निदान और बेहतर उपचार संभव है।
उपचार और प्रबंधन
यदि ओवेरियन कैंसर का पता प्रारंभिक अवस्था में चल जाए, तो इसका सफल उपचार संभव है। उपचार की योजना कैंसर के प्रकार, अवस्था और रोगी की समग्र स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करती है। सामान्यतः उपचार में सर्जरी द्वारा कैंसरग्रस्त ऊतक को हटाया जाता है, जिसके बाद कीमोथेरेपी दी जाती है। कुछ मामलों में टार्गेटेड थेरेपी या हार्मोनल उपचार भी अपनाया जाता है। उन्नत अवस्था में HIPEC जैसी आधुनिक तकनीकें प्रभावी सिद्ध हो रही हैं।
ओवेरियन कैंसर की रोकथाम का कोई निश्चित उपाय नहीं है, हालांकि शोध बताते हैं कि गर्भधारण और स्तनपान से इसका जोखिम कुछ हद तक कम हो सकता है। जिन महिलाओं में मजबूत पारिवारिक इतिहास या ज्ञात आनुवंशिक जोखिम होता है, उनके लिए विशेषज्ञ की सलाह से निवारक सर्जरी पर भी विचार किया जा सकता है।
ओवेरियन कैंसर को इसके सूक्ष्म और देर से प्रकट होने वाले लक्षणों के कारण अक्सर “साइलेंट” रोग कहा जाता है। लेकिन बढ़ती जागरूकता, समय पर जांच और चिकित्सकीय सलाह से इसकी पहचान जल्दी की जा सकती है, जिससे जीवन की गुणवत्ता और जीवन प्रत्याशा दोनों में सुधार संभव है।
